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मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए नोटिस, 193 विपक्षी सांसदों ने किए साइन

On: March 13, 2026 1:02 PM
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नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने को लेकर देश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए संसद में औपचारिक नोटिस देने का निर्णय लिया है। बताया जा रहा है कि यह नोटिस शुक्रवार को संसद के किसी एक सदन में पेश किया जा सकता है।

यह पहली बार है जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस तरह का सख्त कदम उठाने की तैयारी की गई है। इससे पहले 1991 में टीएन शेषन और 2006 में नवीन चावला के खिलाफ शिकायतें और ज्ञापन दिए गए थे, लेकिन उन्हें हटाने के लिए औपचारिक नोटिस पेश नहीं किया गया था।

सांसदों के फिजिकल सिग्नेचर से तैयार किया गया नोटिस
सूत्रों के अनुसार इस नोटिस को खास तौर पर गंभीरता दिखाने के लिए डिजिटल सिग्नेचर के बजाय सभी सांसदों के फिजिकल हस्ताक्षरों के साथ तैयार किया गया है। बताया जा रहा है कि लोकसभा के करीब 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं।

नियमों के अनुसार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव के लिए लोकसभा के कम से कम 100 और राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। इस लिहाज से विपक्ष ने जरूरी संख्या से अधिक समर्थन जुटा लिया है।

इंडिया गठबंधन के दलों का समर्थन
जानकारी के मुताबिक विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के लगभग सभी दलों के सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा आम आदमी पार्टी के सांसदों ने भी इस पर समर्थन दिया है, हालांकि पार्टी फिलहाल इस गठबंधन का औपचारिक हिस्सा नहीं मानी जा रही है।

मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगाए गए सात आरोप

विपक्षी दलों द्वारा तैयार किए गए नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त पर कुल सात गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं

पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप
कुछ मामलों में भेदभावपूर्ण निर्णय लेने के आरोप
चुनावी गड़बड़ियों की जांच में बाधा डालने की बात
मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने के आरोप
प्रशासनिक अधिकारों के कथित दुरुपयोग
मतदाता सूची के विशेष संशोधन को लेकर विवाद
चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर सवाल

हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी

कानून के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया के तहत हटाया जा सकता है, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है। यह प्रक्रिया Judges (Inquiry) Act, 1968 के प्रावधानों के तहत होती है।

यदि दोनों सदनों में प्रस्ताव की सूचना एक ही दिन दी जाती है तो तब तक कोई जांच समिति गठित नहीं की जाती, जब तक दोनों सदन प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर लेते। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति संयुक्त रूप से एक जांच समिति का गठन करते हैं।

जांच समिति कैसे करती है काम

जांच समिति में आमतौर पर तीन सदस्य होते हैं
भारत के प्रधान न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के कोई न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद। समिति की कार्यवाही अदालत की तरह होती है, जिसमें गवाहों और आरोपियों से जिरह की जाती है। इस दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाता है।

रिपोर्ट के बाद शुरू होती है महाभियोग प्रक्रिया

समिति अपनी जांच पूरी करने के बाद रिपोर्ट संसद को सौंपती है। इसके बाद ही महाभियोग की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है। किसी न्यायाधीश की तरह ही मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होना जरूरी होता है।
जब संसद में इस प्रस्ताव पर चर्चा होगी, तब मुख्य चुनाव आयुक्त को सदन के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर अपना पक्ष रखने का अधिकार भी प्राप्त होता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने देश की राजनीतिक सरगर्मियों को तेज कर दिया है और आने वाले दिनों में संसद में इस मुद्दे पर तीखी बहस होने की संभावना जताई जा रही है।

Vishwajeet

मेरा नाम विश्वजीत कुमार है। मैं वर्तमान में झारखंड वार्ता (समाचार संस्था) में कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हूं। समाचार लेखन, फीचर स्टोरी और डिजिटल कंटेंट तैयार करने में मेरी विशेष रुचि है। सटीक, सरल और प्रभावी भाषा में जानकारी प्रस्तुत करना मेरी ताकत है। समाज, राजनीति, खेल और समसामयिक मुद्दों पर लेखन मेरा पसंदीदा क्षेत्र है। मैं हमेशा तथ्यों पर आधारित और पाठकों के लिए उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूं। नए विषयों को सीखना और उन्हें रचनात्मक अंदाज में पेश करना मेरी कार्यशैली है। पत्रकारिता के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश करता हूं।

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