
जब हर दरवाजा बंद हो जाए,तब किसी की आवाज बनने के लिए…!!
आकाश लोहार
गढ़वा
खबर सिर्फ खबर नहीं होती,कभी खुद से पूछिए,हम पत्रकार किसके लिए हैं,क्या सिर्फ खबर दिखाने के लिए,क्या सिर्फ कैमरा चलाने के लिए,क्या सिर्फ लाइक,व्यूज और वायरल होने के लिए,नहीं,एक सच्चा पत्रकार उस आवाज के लिए होता है,जो खुद अपनी आवाज नहीं बन सकती,उस गरीब के लिए,जिसकी फरियाद सरकारी दफ्तर की फाइलों में दब जाती है,उस मां के लिए,जिसकी आंखें अपने बेटे के इंतजार में पथरा जाती हैं,उस किसान के लिए,जिसकी मेहनत खेत में तो दिखाई देती है,लेकिन उसकी मजबूरी किसी को दिखाई नहीं देती,उस छात्र के लिए,जिसके हाथ में किताब होनी चाहिए,लेकिन वह अपने हक के लिए सड़क पर खड़ा है।
जहां कोई नहीं पहुंचता,वहां पत्रकार पहुंचता है :- पत्रकारिता सिर्फ घटनाओं को लिख देने का नाम नहीं है,पत्रकारिता उस दर्द को महसूस करने का नाम है,जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता,जब किसी गरीब का घर टूटता है,तो कैमरे में सिर्फ टूटी दीवारें दिखाई देती हैं,लेकिन पत्रकार को उन दीवारों के पीछे एक परिवार के सपने टूटते हुए दिखाई देने चाहिए,जब सड़क पर कोई घायल पड़ा होता है,तो वह सिर्फ एक हादसे की खबर नहीं,बल्कि किसी परिवार के लिए जिंदगी भर का दर्द हो सकता है।
हम सवाल इसलिए पूछते हैं,क्योंकि किसी को तो पूछना होगा :- कभी हमारे सवाल किसी को चुभते हैं,कभी हमारी खबर से कोई नाराज होता है,कभी हमारे सच को दबाने की कोशिश होती है,लेकिन अगर पत्रकार भी सवाल पूछने से डर जाए,तो फिर उस आम आदमी के सवाल कौन पूछेगा,पत्रकार का काम किसी के खिलाफ होना नहीं है,पत्रकार का काम सच के साथ खड़ा होना है।
कलम बिक जाए,तो खबर मर जाती है :- पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत उसका कैमरा नहीं,उसकी ईमानदारी है,क्योंकि कैमरा तो हर कोई उठा सकता है,लेकिन सच के साथ खड़े होने का साहस हर किसी में नहीं होता,एक पत्रकार को तय करना पड़ता है कि उसे भीड़ के साथ चलना है या सच के साथ,क्योंकि खबर कितनी बड़ी है,यह मायने नहीं रखता,खबर कितनी सच्ची है,यह मायने रखता है।
एक छोटी सी खबर…किसी की जिंदगी बदल सकती है :- कभी कभी हमें लगता है कि हमने बस एक छोटी सी खबर की है,लेकिन हो सकता है उसी खबर को देखकर किसी अधिकारी की नजर उस समस्या पर पड़ जाए,हो सकता है किसी गरीब को उसका अधिकार मिल जाए,हो सकता है किसी पीड़ित की आवाज न्याय के दरवाजे तक पहुंच जाए और उस दिन पत्रकार को समझ आता है कि उसने सिर्फ खबर नहीं लिखी थी,उसने किसी की जिंदगी में उम्मीद लिखी थी।
हम जनता के हैं…जनता की आवाज के लिए हैं :- पत्रकार किसी एक नेता का नहीं,किसी एक अधिकारी का नहीं,किसी एक पार्टी का नहीं,पत्रकार जनता का होता है,उस जनता का,जो भरोसा करके अपनी कहानी हमारे सामने रखती है,किसी के पास पैसा नहीं होता,किसी के पास पहुंच नहीं होती,किसी के पास बड़े लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का रास्ता नहीं होता,लेकिन उसके पास एक उम्मीद होती है शायद पत्रकार उसकी आवाज बन जाए और यही पत्रकारिता की असली पहचान है,नाम बड़ा हो या छोटा,चैनल बड़ा हो या छोटा,कैमरा महंगा हो या साधारण,अगर खबर में सच है,संवेदना है और इंसानियत है,तो वही पत्रकारिता लोगों के दिल में जगह बनाती है,क्योंकि लोग सिर्फ खबर सुनना नहीं चाहते,लोग चाहते हैं कि कोई उनकी तकलीफ को समझे।
आखिर हम पत्रकार किसके लिए..? :- हम उस बच्चे के लिए हैं,जिसके सपने गरीबी के नीचे दब रहे हैं,हम उस मां के लिए हैं,जिसकी आंखों में बेटे की चिंता है,हम उस बुजुर्ग के लिए हैं,जिसकी आवाज व्यवस्था तक नहीं पहुंच रही,हम उस किसान के लिए हैं,जिसकी मेहनत का हिसाब कोई नहीं पूछता,हम उस युवा के लिए हैं,जो अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहा है और सबसे बढ़कर,हम उस आम इंसान के लिए हैं,जो आज भी मानता है कि उसकी आवाज कहीं न कहीं जरूर सुनी जाएगी,इसलिए याद रखिए कि खबर सिर्फ खबर नहीं होती,खबर किसी का दर्द होती है,खबर किसी की उम्मीद होती है,खबर किसी की आवाज होती है और कभी कभी खबर किसी की जिंदगी बदलने की वजह भी बन जाती है,क्योंकि हम पत्रकार हैं,सिर्फ खबर बताने के लिए नहीं,बल्कि उस सच को सामने लाने के लिए,जिसे दुनिया से छिपा दिया गया है और शायद इसी सवाल का जवाब है,हम पत्रकार उनके लिए हैं,जिनकी आवाज बनना किसी और ने जरूरी नहीं समझा।






