
अस्पतालों में व्यवस्था का हिसाब मांगने से लेकर 74 लाख के स्कूल भवन पर फटकार तक,नाजिया के परिवार के आंसू पोंछने पहुंचीं शांति देवी
आकाश लोहार
गढ़वा
किसी के पास पद होता है,किसी के पास अधिकार होता है और किसी के पास अपनी बात मनवाने की ताकत होती है,लेकिन इन सबसे बढ़कर एक चीज होती है इंसानियत,क्योंकि पद की असली गरिमा तब बढ़ती है,जब उस पर बैठा व्यक्ति दूसरों की तकलीफ को महसूस करे,गलत व्यवस्था पर सवाल उठाए और दुख की घड़ी में किसी पीड़ित परिवार के दरवाजे तक पहुंचकर उसका दर्द बांटने का प्रयास करे,जनता को भी अपने जनप्रतिनिधि से आखिर चाहिए क्या,अस्पताल में मरीजों को बेहतर इलाज मिले,स्कूल में बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो,गांव की समस्याओं को गंभीरता से सुना जाए और संकट की घड़ी में पीड़ित परिवार को यह एहसास हो कि वह अकेला नहीं है,जनता की इसी उम्मीद के बीच गढ़वा जिला परिषद अध्यक्ष शांति देवी की कार्यशैली के कुछ ऐसे उदाहरण सामने आते हैं,जो जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के अलग अलग पहलुओं को सामने रखते हैं,कभी अस्पताल पहुंचकर व्यवस्थाओं का हिसाब मांगना,कभी लाखों रुपये की लागत से बने स्कूल की स्थिति पर अधिकारियों को जवाबदेह बनाने की कोशिश करना और कभी एक मासूम बच्ची की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद शोकाकुल परिवार के बीच पहुंचकर उसे ढाढ़स बंधाना ये अलग अलग परिस्थितियां हैं,लेकिन तीनों के केंद्र में जनता की परेशानी है।
अनुमंडलीय अस्पताल नगर ऊंटारी में औचक निरीक्षण,आखिर कहां हुआ काम और कहां रह गई कमी :- अस्पताल वह जगह है,जहां इंसान अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी उम्मीद लेकर पहुंचता है,गरीब परिवार के लिए सरकारी अस्पताल केवल इलाज का केंद्र नहीं,बल्कि बीमारी से लड़ने का सबसे बड़ा सहारा होता है,ऐसे में वहां की व्यवस्था में किसी भी तरह की कमी सीधे आम लोगों को प्रभावित करती है,इसी जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए जिला परिषद अध्यक्ष शांति देवी ने श्री बंशीधर नगर स्थित अनुमंडलीय अस्पताल का औचक निरीक्षण किया,निरीक्षण के दौरान स्वास्थ्य व्यवस्था और संबंधित कार्यों की स्थिति को लेकर जानकारी मांगी गई,उनकी ओर से यह मांग उठाना कि कौन कौन से काम पूरे हुए हैं और कौन से काम अब तक अधूरे हैं,अपने आप में जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल है,आखिर जब सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य सुविधाओं पर जनता के पैसे खर्च होते हैं,तो लोगों को यह जानने का अधिकार है कि उन पैसों से क्या काम हुआ और मरीजों को उसका कितना लाभ मिल रहा है,सवाल सीधा है अस्पताल में मरीज इलाज कराने पहुंचता है,तो उसे बेहतर सुविधा मिलनी ही चाहिए,व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वालों को भी अपने काम का हिसाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए,शांति देवी के इस निरीक्षण का महत्व इसी बात में है कि स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल कागजों पर नहीं,बल्कि अस्पताल पहुंचकर समझने और कामकाज की जानकारी लेने की कोशिश की गई।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रमना में भी औचक निरीक्षण,काम का हिसाब मांगकर जवाबदेही पर जोर :- नगर ऊंटारी के बाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रमना में भी शांति देवी ने औचक निरीक्षण किया,यहां भी स्वास्थ्य केंद्र में हुए और नहीं हुए कार्यों का विवरण मांगने की पहल की गई,एक जनप्रतिनिधि जब अस्पताल पहुंचकर व्यवस्थाओं की जानकारी मांगता है,तो उसका उद्देश्य केवल कमियां गिनाना नहीं,बल्कि यह समझना भी होना चाहिए कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए किन कदमों की जरूरत है,स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज,बुनियादी सुविधाओं और मरीजों की जरूरतों से जुड़े सवाल आम लोगों के जीवन से सीधे जुड़े होते हैं,ऐसे में निरीक्षण के दौरान उठाए गए सवालों का जवाब मिलना और कमियों को दूर करने के लिए कार्रवाई होना बेहद जरूरी है,क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था में लापरवाही का खामियाजा कोई फाइल नहीं भुगतती,बल्कि वह मरीज भुगतता है,जो उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचता है,नगर ऊंटारी और रमना में निरीक्षण कर कार्यों का विवरण मांगने की पहल इस बात को रेखांकित करती है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करना जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारियों में शामिल है,अब इन निरीक्षणों की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि संबंधित विभागों से जानकारी मिलने के बाद कमियों को दूर करने और सुविधाओं में सुधार के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
बहियार खुर्द में 74 लाख रुपये का स्कूल भवन,फिर व्यवस्था को लेकर सवाल क्यों :- जनता के पैसे से बनने वाला स्कूल भवन केवल ईंट,सीमेंट और छत का ढांचा नहीं होता,वह बच्चों के भविष्य की नींव होता है,उसी भवन में बैठकर बच्चे शिक्षा प्राप्त करते हैं,सपने देखते हैं और अपने जीवन को बेहतर बनाने की तैयारी करते हैं,लेकिन जब लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद स्कूल की व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े होते हैं,तो यह चिंता केवल शिक्षा विभाग तक सीमित नहीं रहती,यह उन अभिभावकों की चिंता बन जाती है,जो अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद में उन्हें स्कूल भेजते हैं,गढ़वा जिला के रमना प्रखंड अंतर्गत बहियार खुर्द में करीब 74 लाख रुपये की लागत से बने स्कूल भवन की व्यवस्था को लेकर जिला परिषद अध्यक्ष शांति देवी ने सवाल उठाए और सुधार की जरूरत पर संबंधित लोगों को फटकार लगाई,74 लाख रुपये कोई छोटी रकम नहीं है,यह जनता की मेहनत की कमाई है,जिसका इस्तेमाल बच्चों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराने के लिए होना चाहिए,ऐसे में यह पूछना जरूरी है कि भवन और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं पर खर्च की गई राशि के अनुरूप सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं,यदि कहीं कमी है,तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है और सुधार कब तक होगा,शांति देवी का इस मामले में हस्तक्षेप यह संदेश देता है कि सरकारी योजनाओं और सार्वजनिक निर्माण कार्यों को केवल पूरा दिखा देना पर्याप्त नहीं है,उनका वास्तविक लाभ जनता तक पहुंचना भी उतना ही आवश्यक है,स्कूल की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाना और सुधार के लिए फटकार लगाना तभी सार्थक होगा,जब इसके बाद बच्चों को बेहतर सुविधाएं मिलें और सामने आई कमियों को दूर किया जाए,क्योंकि 74 लाख रुपये की लागत से बना स्कूल तभी सफल माना जाएगा,जब उसकी व्यवस्था बच्चों के भविष्य को संवारने में मदद करे।
नाजिया खातून की मौत,जब निरीक्षण करने वाली जनप्रतिनिधि शोकाकुल परिवार के बीच पहुंचीं :- जनसेवा का एक पक्ष व्यवस्था से सवाल पूछना है,तो दूसरा पक्ष दुख की घड़ी में किसी पीड़ित परिवार के साथ खड़े होने का प्रयास करना है,बहियार कलां में नाजिया खातून का शव शाम के समय संदिग्ध परिस्थितियों में कुएं से बरामद होने की घटना ने परिवार और आसपास के लोगों को झकझोर दिया,एक परिवार के लिए अपनी बच्ची को खोने का दर्द शब्दों में बयान करना आसान नहीं होता,ऐसे समय में घर का हर कोना उसकी याद दिलाता है और भविष्य से जुड़ी सारी उम्मीदें अचानक बिखर जाती हैं,नाजिया की मौत की खबर सामने आने के बाद जिला परिषद अध्यक्ष शांति देवी अगली सुबह गढ़वा सदर अस्पताल पहुंचीं,वहां पोस्टमार्टम की प्रक्रिया के दौरान मौजूद रहने के बाद वह पीड़ित परिवार के घर पहुंचीं और परिजनों से मुलाकात कर उन्हें ढाढ़स बंधाया,यह केवल किसी घटना के बाद औपचारिक संवेदना व्यक्त करने का मामला नहीं था,एक बच्ची को खो चुके परिवार के बीच पहुंचना,उनकी बात सुनना और उन्हें इस मुश्किल घड़ी में हिम्मत देने का प्रयास करना संवेदनशीलता का मानवीय पक्ष है,जिस घर में एक दिन पहले तक बेटी की आवाज गूंजती थी,वहां अगले दिन मातम पसरा हो,तो उस परिवार का दर्द समझने के लिए केवल शब्द काफी नहीं होते,वहां जरूरत होती है संवेदना की,अपनेपन की और किसी ऐसे व्यक्ति की,जो कुछ देर उनके बीच बैठकर उनकी पीड़ा सुने,नाजिया की मौत किन परिस्थितियों में हुई,इसका सही पता जांच और संबंधित प्रक्रिया के बाद ही चल सकता है,लेकिन इस दुखद घटना के बाद शोकाकुल परिवार से मिलने पहुंचना यह दिखाता है कि जनप्रतिनिधि की भूमिका केवल विकास कार्यों और प्रशासनिक निरीक्षण तक सीमित नहीं होती,दुख की घड़ी में लोगों के बीच पहुंचना भी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है,किसी परिवार का दर्द पूरी तरह बांटा नहीं जा सकता,लेकिन उस दर्द में साथ खड़े होने का प्रयास जरूर किया जा सकता है।
कार्यालय में फरियादी नहीं,परिवार का सदस्य समझकर सुनना यही है अपनेपन की पहचान :- किसी जनप्रतिनिधि के कार्यालय तक पहुंचने वाला हर व्यक्ति किसी न किसी उम्मीद के साथ आता है,कोई आर्थिक परेशानी से जूझ रहा होता है,किसी को सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा होता,कोई अपने गांव की समस्या लेकर पहुंचता है,तो कोई परिवार से जुड़ी मुश्किल का समाधान चाहता है,कई लोगों के लिए अपनी परेशानी बताना भी आसान नहीं होता,वे सोचते हैं कि उनकी बात सुनी जाएगी या नहीं,उन्हें सम्मान मिलेगा या फिर दूसरे कार्यालय का रास्ता दिखा दिया जाएगा,ऐसे में जब कोई जनप्रतिनिधि सामने बैठे व्यक्ति की बात धैर्य से सुनता है,उसे सम्मान देता है और उसकी समस्या को समझने का प्रयास करता है,तो उस व्यक्ति का भरोसा मजबूत होता है,शांति देवी की कार्यशैली का एक अहम पहलू लोगों के साथ यही अपनापन बताया जाता है,कार्यालय में मिलने आने वाले लोगों को केवल जनता या फरियादी नहीं,बल्कि अपने परिवार का सदस्य समझकर बात करना और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए हरसंभव प्रयास करने का भरोसा देना जनसंपर्क का मानवीय रूप है,क्योंकि कभी कभी किसी गरीब व्यक्ति को सबसे ज्यादा तकलीफ उसकी आर्थिक परेशानी से नहीं,बल्कि इस बात से होती है कि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है,ऐसे में सम्मान के साथ उसकी बात सुनना,उसे उचित मार्गदर्शन देना और समस्या के समाधान के लिए पहल करना भी महत्वपूर्ण सेवा है।
अस्पताल,स्कूल,गांव और जरूरतमंदों के घर,जनसेवा की असली परीक्षा इन्हीं जगहों पर होती है :- किसी जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी केवल सरकारी बैठकों में शामिल होना या सार्वजनिक कार्यक्रमों में मौजूद रहना नहीं है,उसकी भूमिका उन जगहों पर भी महत्वपूर्ण होती है,जहां आम लोग रोजमर्रा की समस्याओं से जूझते हैं,अस्पताल में मरीजों की सुविधा का सवाल हो,स्कूल में बच्चों के भविष्य का मुद्दा हो,गांव में बुनियादी समस्याओं की बात हो या किसी जरूरतमंद परिवार की परेशानी इन सभी विषयों पर ध्यान देना जनता के प्रति जवाबदेही का हिस्सा है,शांति देवी के बताए गए कार्यों में ये अलग अलग पहलू सामने आते हैं,अस्पतालों का निरीक्षण कर काम का विवरण मांगना,स्कूल की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाना और नाजिया खातून की मौत के बाद उसके परिवार से मिलने पहुंचना उनकी सक्रियता के अलग अलग उदाहरण हैं,इन कार्यों का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि जनप्रतिनिधि संबंधित स्थान पर पहुंचे,बल्कि इस बात में है कि वहां की समस्या को समझा जाए और उसके समाधान के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं,जनता को ऐसी कार्यशैली की जरूरत है,जिसमें निरीक्षण भी हो,सवाल भी हों,संवेदना भी हो और समस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस प्रयास भी हों।
आखिर जिला परिषद अध्यक्ष हो तो शांति देवी जैसी क्यों कहा जा रहा है :- इस सवाल का जवाब किसी एक घटना में नहीं,बल्कि उन अलग अलग जिम्मेदारियों में छिपा है,जिनसे एक जनप्रतिनिधि को रोजाना सामना करना पड़ता है,एक तरफ अस्पतालों की व्यवस्था को लेकर जवाबदेही मांगने का सवाल है,दूसरी तरफ 74 लाख रुपये की लागत से बने स्कूल भवन में बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करने की चिंता है,वहीं,नाजिया खातून की मौत के बाद शोकाकुल परिवार से मिलने पहुंचने का मानवीय पहलू भी है,इन तीनों परिस्थितियों में जनता की अपेक्षा अलग अलग है,अस्पताल में उसे बेहतर स्वास्थ्य सुविधा चाहिए,स्कूल में बच्चों के लिए बेहतर व्यवस्था चाहिए और दुख की घड़ी में परिवार को संवेदना और सहारे की जरूरत होती है,जो जनप्रतिनिधि इन जिम्मेदारियों को समझने और निभाने का प्रयास करता है,उससे जनता की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से बढ़ती हैं,हालांकि,किसी भी जनप्रतिनिधि के काम का वास्तविक मूल्यांकन उसके प्रयासों के साथ साथ उनके परिणामों के आधार पर होना चाहिए,निरीक्षण के बाद अस्पतालों में क्या सुधार हुआ,स्कूल की कमियां कितनी दूर हुईं और जरूरतमंदों को कितनी सहायता मिली ये सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं,क्योंकि जनसेवा की असली सफलता तभी है,जब लोगों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव दिखाई दे।
पद और कुर्सी से बड़ी होती है जनता के दिल में बनी जगह :- पद हमेशा किसी के पास नहीं रहता,जिम्मेदारियां बदलती रहती हैं और समय के साथ कुर्सियां भी बदल जाती हैं,लेकिन किसी व्यक्ति ने मुश्किल समय में कैसा व्यवहार किया,किसी गरीब की बात कैसे सुनी और किसी दुखी परिवार के बीच किस भावना से पहुंचा ये बातें लोगों की स्मृतियों में लंबे समय तक बनी रहती हैं,जनता को ऐसे जनप्रतिनिधि की जरूरत है,जो उसके बीच रहे,उसकी परेशानियों को समझे,गलत व्यवस्था पर सवाल उठाए और समस्याओं के समाधान के लिए संबंधित विभागों के साथ मिलकर काम करे,जनता यह भी चाहती है कि उसका प्रतिनिधि किसी पीड़ित परिवार के घर पहुंचे,उसके दुख को समझे और उसे सम्मान के साथ अपनी बात रखने का अवसर दे,क्योंकि जनता की नजर में जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई पद या प्रचार नहीं,बल्कि वह भरोसा है,जिसके साथ कोई आम आदमी उसके पास अपनी समस्या लेकर पहुंचता है।
जनसेवा की असली पहचान यही है :- अस्पताल में मरीजों की परेशानी को समझना,स्कूल में बच्चों के भविष्य की चिंता करना,गांवों में लोगों की समस्याएं सुनना और किसी दुखी परिवार के बीच पहुंचकर उसे ढांढस बंधाना जनसेवा के ये सभी रूप एक दूसरे से अलग जरूर हैं,लेकिन इनका उद्देश्य एक ही है,लोगों की समस्याओं को समझना और उनके साथ खड़े होने का प्रयास करना,नगर ऊंटारी और रमना के अस्पतालों का निरीक्षण,बहियार खुर्द के स्कूल भवन की व्यवस्था पर सवाल और नाजिया खातून की मौत के बाद उसके परिवार से मुलाकात ये घटनाएं जिला परिषद अध्यक्ष शांति देवी की कार्यशैली के ऐसे उदाहरण हैं,जिन पर चर्चा की जा सकती है,इन प्रयासों को और सार्थक बनाने का रास्ता भी स्पष्ट है,अस्पतालों की कमियां दूर हों,स्कूल की व्यवस्था सुधरे और जरूरतमंद परिवारों को वास्तविक सहायता मिले,क्योंकि जनता को ऐसा जनप्रतिनिधि चाहिए,जो केवल उसकी परेशानी सुने नहीं,बल्कि समाधान की दिशा में आगे बढ़े,जो केवल पद की जिम्मेदारी न निभाए,बल्कि उस जिम्मेदारी के पीछे छिपे मानवीय कर्तव्य को भी समझे और यही वह सोच है,जो किसी जनप्रतिनिधि को जनता के बीच अपनी अलग पहचान बनाने का अवसर देती है,जिला परिषद अध्यक्ष हो तो शांति देवी जैसी,जनता के बीच पहुंचने वाली,समस्याओं पर सवाल उठाने वाली और दुख की घड़ी में लोगों का हाल जानने पहुंचने वाली,आखिरकार,जनसेवा की असली पहचान यही है कि जनता खुद को अपने प्रतिनिधि से जुड़ा हुआ महसूस करे।




