
किसान के बेटे धार्मेंजय हेम्ब्रम की लेखनी ने संथाली साहित्य को दी नयी उड़ान
जामताड़ा ; जामताड़ा के।।। श्रृं।।।।।।। श्रृं। श्रृं बिन्दापाथर थाना क्षेत्र के हिदलजोड़ी गांव की मिट्टी से निकले धार्मेंजय हेम्ब्रम आज संथाली साहित्य की नई पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर बन रहे हैं। किसान परिवार में पले-बढ़े धार्मेंजय ने सीमित संसाधनों के बीच साहित्य को अपनी साधना बनाया। उनकी रचनाओं में संथाली समाज का जीवन, प्रकृति, प्रेम, संघर्ष, भाषा-संस्कृति और अस्मिता एक साथ दिखायी देती है। माटी से मिली भाषा, लेखनी बनी पहचान गांव का सहज जीवन, खेतों की हरियाली, लोकगीतों की लय और आदिवासी परंपराएं धार्मेंजय के व्यक्तित्व की पहली पाठशाला रहीं। किसान परिवार में जन्म लेने के कारण उन्होंने श्रम और संघर्ष की करीब से देखा। आर्थिक सीमाओं के बावजूद मातृभाषा और संस्कृति से उनका जुड़ाव लगातार मजबूत होता गया। वरिष्ठ साहित्यकारों के सान्निध्य ने उनकी साहित्यिक दृष्टि को विस्तार दिया, उन्होंने लेखन को केवल अभिव्यक्ति नाहीं, बल्कि समाज और संस्कृति की चेतना को मजबूत करने का माध्यम बनाया। कविताओं में प्रेम भी, पहचान का सवाल भी उनका चर्चित संथाली कविता संग्रह ‘दुलाइ रेयाक् मेत् दाक् संथाली समाज की संवेदनाओं, स्मृतियों, प्रकृति और बदलते सामाजिक वधार्थ को सामने लाता है। उनकी कविताओं में प्रेम और प्रकृति के साथ अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहने की बेचैनी भी दिखाई देती है। उनकी रचनाएं पाठकों को अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति गर्व का भाव देती हैं।
‘मन की बात’ तक पहुंचा संताल हूल गीत धार्मेंजय कवि के साथ गीतकार और गायक भी हैं। संताल हुल पर आधारित उनके गीत ‘जांगा रे पायगान’ को राष्ट्रीय पहचान तब मिली, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में इसका उल्लेख किया। किसी ग्रामीण युवा साहित्यकार के लिए यह उपलब्धि व्यक्तिगत सम्मान से कहीं आगे है। इसने संथाली भाषा और आदिवासी सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने का काम किया।
अनुवाद से बना दो भाषाओं के बीच सेतु धार्मेंजय का योगदान मौलिक लेखन तक सीमित नहीं है। उन्होंने हिंदी की महत्वपूर्ण पुस्तकों का संथाली में अनुवाद कर दोनों भाषाओं के बीच साहित्यिक संवाद को मजबूत किया है। ‘लाड़हाई आर सांघार’, ‘संताली सांवहेत् रेन नामडाक सांवहेंदिया बाबूलाल मुर्मू आदिवासी’ और साहित्य अकादमी की चर्चित पुस्तक ‘लुलु का आविष्कार का संथाली अनुवाद उनकी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल है।
भाषा संरक्षण को बनाया मिशन
धार्मेंजय मानते हैं कि भाषा किसी समाज की आत्मा और उसकी पहचान की सबसे मजबूत कड़ी है। इसी सोच के साथ वे नई पीढ़ी को संथाली में पढ़ने-लिखने और सूजन के लिए प्रेरित करते हैं। वर्ष 2024 में हिजला मेला कवि सम्मेलन में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, दुमका ने उन्हें सम्मानित किया। विश्व आदिवासी दिवस समारोह में झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रविंद्रनाथ महतो ने भी उनके साहित्यिक योगदान को सराहा और इसकी प्रतिभा और जज्बे को प्रभात खबर देवघर की ओर से भी संताल युथ आईकॉन-2025 से सम्मानित कर चुके हैं। वर्तमान में वे भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के भारतीय भाषाविज्ञान डेटा संकाय में जूनियर रिसोर्स पर्सन-II के रूप में संथाली भाषा के संरक्षण, प्रलेखन और विकास से जुड़े कार्य कर रहे हैं। और अनुवाद का कार्य अभी भी चल रहा है ।किसान परिवार की मिट्टी से निकलकर राष्ट्रीय पहचान तक पहुंचे धार्मेंजय हेम्ब्रम का सफर बताता है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती। अपनी भाषा, संस्कृति और जड़ों से जुड़कर भी राष्ट्रीय मंच पर जगह बनाई जा सकती है। उनकी लेखनी संथाली समाज की स्मृतियों को शब्द देती है और नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा पर गर्व करना सिखाती है।




