
नई दिल्ली: भारत में मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था फिलहाल जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने फांसी के पारंपरिक तरीके की जगह कम पीड़ादायक विकल्प, जैसे जानलेवा इंजेक्शन या अन्य माध्यम अपनाने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि मौजूदा कानूनी और संवैधानिक व्यवस्था के तहत फांसी के जरिए मृत्युदंड दिए जाने के तरीके को असंवैधानिक या अवैध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग भी स्वीकार नहीं की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि उसके फैसले का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में मौत की सजा देने के किसी वैकल्पिक तरीके पर विचार नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार चाहे तो वैज्ञानिक और चिकित्सकीय पहलुओं का अध्ययन कराने के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित कर सकती है।
2017 में दाखिल हुई थी याचिका
वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने वर्ष 2017 में यह जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में भारत में फांसी के जरिए मृत्युदंड दिए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे अधिक मानवीय और कम पीड़ादायक विकल्प से बदलने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि फांसी की प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है। इसके मुकाबले गोली मारने या घातक इंजेक्शन जैसे तरीकों को अपेक्षाकृत कम समय लेने वाला बताया गया था। याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि मौत की सजा पाए कैदी को फांसी और अन्य वैकल्पिक तरीकों में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए।
CrPC की धारा 354(5) को चुनौती
याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई थी। इसी प्रावधान के तहत मौत की सजा पाए दोषी को गर्दन से तब तक फांसी पर लटकाने का प्रावधान है, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।
याचिकाकर्ता ने इस प्रक्रिया को संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले जीवन और गरिमा के अधिकार के खिलाफ बताया था। दलील दी गई कि किसी दोषी को मौत की सजा सुनाए जाने के बावजूद उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए, जिससे उसकी मृत्यु की प्रक्रिया अनावश्यक रूप से पीड़ादायक या अमानवीय हो।
बड़ी बेंच को मामला भेजने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने से इनकार करते हुए मौजूदा व्यवस्था को तत्काल असंवैधानिक घोषित करने से इनकार कर दिया। इसका सीधा मतलब है कि भारत में मौत की सजा को लागू करने के लिए फांसी का मौजूदा कानूनी तरीका फिलहाल प्रभावी रहेगा।
हालांकि, अदालत ने भविष्य में वैकल्पिक तरीकों की संभावनाओं को पूरी तरह बंद नहीं किया है। केंद्र सरकार वैज्ञानिक और चिकित्सकीय विशेषज्ञों की राय के आधार पर इस दिशा में अध्ययन कर सकती है। ऐसे में आने वाले समय में मृत्युदंड देने के तरीके को लेकर नई बहस और संभावित नीतिगत बदलाव की गुंजाइश बनी हुई है।






