
रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले एक भारी वाहन चालक के परिवार को बड़ी राहत देते हुए मुआवजे की राशि में तीन गुना से अधिक की बढ़ोतरी की है। कोर्ट ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT), पाकुड़ की ओर से निर्धारित 5.76 लाख रुपये के मुआवजे को बढ़ाकर 18.30 लाख रुपये कर दिया है। इसके साथ ही बीमा कंपनी को बढ़ी हुई राशि पर 6 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज देने का निर्देश दिया गया है।
यह फैसला मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक ने 28 अगस्त 2026 को वर्ष 2014 में दायर M.A. No. 21 of 2014 की सुनवाई के दौरान सुनाया। कोर्ट के आदेश के बाद मृतक चालक के आश्रित परिवार को अब पहले से काफी अधिक आर्थिक सहायता मिल सकेगी।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भारी वाहन चालकों के कार्य की प्रकृति को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारी वाहन चलाना एक कुशल कार्य (Skilled Work) है। इसलिए किसी भारी वाहन चालक को केवल सेमी-स्किल्ड श्रमिक की श्रेणी में रखना उचित नहीं है। कोर्ट की यह टिप्पणी मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में मृतक की आय निर्धारित करने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आय का आकलन करते समय मृतक के पेशे और उसके कौशल को भी उचित महत्व दिया जाना जरूरी है।
मामला वर्ष 2012 की उस सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें भारी वाहन चालक जहांगीर खान की मौत हो गई थी। दुर्घटना के बाद उनके परिवार की ओर से मुआवजे के लिए दावा दायर किया गया था। पाकुड़ स्थित MACT ने मृतक की मासिक आय 4,500 रुपये मानते हुए परिवार के लिए कुल 5,76,000 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था। हालांकि, इस निर्धारण को चुनौती देते हुए मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने मृतक के पेशे और भारी वाहन चालक के रूप में उसके कौशल को ध्यान में रखते हुए उसकी मासिक आय 10,000 रुपये मानी। इसके बाद अदालत ने लागू कानूनी सिद्धांतों के तहत आय में 40 प्रतिशत फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स भी जोड़ा और मुआवजे की पुनर्गणना की।
पुनर्गणना के बाद कोर्ट ने कुल मुआवजे की राशि 18,30,000 रुपये निर्धारित कर दी। हाईकोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को निर्देश दिया है कि वह बढ़ी हुई मुआवजा राशि को 6 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज के साथ जमा करे।
ब्याज की गणना 7 जनवरी 2012 यानी दावा याचिका दायर किए जाने की तारीख से भुगतान होने तक की जाएगी। हालांकि, अपील दाखिल करने में हुई 388 दिनों की देरी की अवधि को ब्याज की गणना से बाहर रखा गया है। इस अवधि के ब्याज से बीमा कंपनी को छूट दी गई है।
कोर्ट के निर्देश के मुताबिक बीमा कंपनी को पूरी राशि छह सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट में जमा करनी होगी।
हाईकोर्ट ने केवल मुआवजे की रकम बढ़ाने तक खुद को सीमित नहीं रखा। अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार को मुआवजे की राशि प्राप्त करने में किसी तरह की परेशानी, बिचौलियों के हस्तक्षेप या शोषण का सामना न करना पड़े।
इसके लिए झारखंड स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (JHALSA) और DLSA साहिबगंज को मृतक के परिवार के साथ सीधे समन्वय करने की जिम्मेदारी दी गई है। दोनों संस्थाओं को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि मुआवजे की राशि सुरक्षित तरीके से लाभार्थियों के बैंक खातों तक पहुंचे और परिवार को रकम प्राप्त करने की प्रक्रिया में अनावश्यक परेशानी न हो।
मामले में अदालत की सहायता के लिए अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा को अमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया था। हाईकोर्ट ने ग्रामीण और साधनहीन दावेदारों के पक्ष को प्रभावी तरीके से अदालत के समक्ष रखने के लिए उनके प्रयासों की विशेष सराहना की। मुख्य न्यायाधीश ने अपने आदेश में अधिवक्ता के सहयोग की प्रशंसा करते हुए उनके प्रति औपचारिक आभार व्यक्त किया। साथ ही JHALSA को उनकी कानूनी फीस का भुगतान करने का निर्देश भी दिया गया।
हाईकोर्ट का यह फैसला सड़क दुर्घटना मुआवजा मामलों में कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। खासकर भारी वाहन चालकों की आय निर्धारित करते समय उनके काम को किस श्रेणी में रखा जाए, इस सवाल पर अदालत की टिप्पणी भविष्य के मामलों में भी उपयोगी हो सकती है। फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि मृतक की आय का आकलन केवल न्यूनतम मजदूरी के आधार पर करने के बजाय उसके पेशे, कौशल और भविष्य की आय की संभावनाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।



